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घर

Winning Entry in TattvaKatha™ - Story Writing Contest in Hindi Language Category by Jigar Pandya



थोड़े से सपने , थोड़ी सी उम्मीदे,  थोड़ा सा हौसला, थोड़ा सा जलना, थोड़े से आँसू ,थोड़ा सा मस्का , थोड़ा सा जुगाड़ , बड़ा सा कर्जा और ढेर सारा परिश्रम के मिश्रण से जो अंतिम पदार्थ बनता है उसे घर कहेते है. 


हुफ़्फ़फ़ घर ; 


बच्चपन मे हमने होश संभालते ही सबसे पहले खेलना सिखा होगा अपने आस पड़ोस के बचों के साथ वो खेल था "घर-घर"। रसोई सब्जी ख़ुर्शी टेबल सब छोटे छोटे, अपनी छोटी सी आँखो से देखी थी वो दुनियां। बड़े होते होते वो छोटा सा खेल कही दिमाग के कोने मे छुुप जाता है। कई सालों बाद जब हम बड़े होते हे, अचानक एक दिन वही छोटा सा खेल हकीकत बनके सामने आता है। जिंदगी का नया मोड़ शुरू होता है उस खेल को वास्तव में खेलने का।


लोग कहते है चार दीवारों से घर नही बनता , उन में रहने वाले इंसानो से घर बनता है। पर मुजे ऐसा नही लगता। वो दीवार का भी बहोत महत्व और एक नज़रिया है बनने का। जैसे अपने जिंदगी में उतार चढ़ाव दुख दर्द का सामना करते हुवे पती पत्नी एक रहेते है उसी तरह  ईंट , रेत , पानी , पत्थर और सीमेंट के ढाँचे से चार दीवारे मजबूत खड़ी होती है। जैसेे हम अपनी जिंदगीमें पती पत्नी का किरदार निभाते है उसी तरह ये घर की बाजू की दीवारो को हम पति पत्नी की उपमा दे सकते है। वो चार दीवारों के मिलने से एक नया आविष्कार होता है। जैसे हमे बच्चे होते है, वैसे माने तो घर की खिड़की को बचों की उपमा दे सकते है। बाहर की दुनिया कैसी है वो हम अंदर से उसे बताते है। बाहर के तुफानो से कैसे लड़ना है वो हम वक़्त बे वक़्त समजाते है। अपना अँश अपना हाथ थामे बाहर की दुनियाँ देखता है और समजता है। घर की चार दीवारों को नीचे जिस लादी से जमीन से जोड़ा जाता है उसे हम माँ कहे सकते है। जिस की गोद मे हम सुकून से सोते है। हर घर मे लादी लगाई जाती है वो लादी का ढलाव एक तरफ होता है ये दर्शाती है कि माँ का प्यार उस ढलाव की तरह अनगिनत बहेता ही रहता है। फिर आखरी में सब से महत्वपूर्ण भूमिका आती है जिसे हम घर की छत कहेते है। पिता का भी तो वही स्थान है। ऊपर रहकर सारे घर की देखभाल करना। बाहर की कठिनाई ओ से घर को बचाना अथाग परिश्रम और संयम से बड़ी मजबुती से हमेशा खड़े रहेना। 

यू तो घर अपने आप मे जब तैयार होता है तो परिवार के जैसे ही होता है। बस हम तो उस परिवार का हिस्सा बनके घर को अपना पन देते है।


 इस पूरे परिवार का एक दिल होता है जिसे हम घर का दरवाजा कहेते है। जी हां.....वो दरवाजे की ख़ासियत यही है कि वो अंदर की और खुलता है । दस्तक देने वाले सगे संबंधि हो या दोस्त, कोई भी बिना घंटियां बजाये अंदर नही आसकता है। पर घर के चार लोगों के पास वो चाबी होती है जिस से वो घर का दरवाजा बिना रोक टोक के खोल के अंदर आ सकते है। परिवार जिसे मिलने के लिये कोई ईतवार, सोमवार या छुट्टियों वाले वार की जरूरत नही होती। 

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छोटा हो या बड़ा हो, घर तो घर होता है,

मिट्टि का हो या सिमेंट का हो, घर तो घर होता है,

शहर मे हो या गाऊँ मे हो, घर तो घर होता है,

‎तेरा हो या मेरा हो, घर तो फिर भी घर होता है।

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हर घर कुछ कहेता है , आपके दिल मे कौन रहेता है?


Jigar Pandya


 
 
 

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